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Naxalite Attack in Amausi


खगडिया के अमौसी गांव में नक्सली हमला… (२ अक्टूबर २००९)

सुबह सुबह उठके स्वभाववश टीवी पर ETV-Bihar-Jharkahnd लगैलियै. कारण TataSky वाला बिहार के लिये इहे एकमात्र चैनल उपलब्ध कैलकै ह. ईक्षा हलै गांधी जी और लाल बहादुर शास्त्री जी के ऊपर कुछ सुने के. लेकिन पहला समाचार मिलो है- कल रात खगडिया के अमौसी गांव में ४०-५० नक्सली आतंकवादी घुस के १७ आदमी के नृशंस हत्या कर देलकै ह्. समाचार सुनावे वाला ई बतावे से नै  चुकलथिन कि मरेवाला सब एक जाति विशेष के हलथिन यानी जातिगत वैमनस्य भी शायद ई वैमनस्य के कारण हो. खगडिया से कोई २०-२२ किमी दूर होवे के कारण और यातायात के सुविधा नै होवे के कारण घटना के समय पुलिस के पहुंचना भी संम्भव नै हलै. सुबह सुबह आसपास के गांव से और धीरे धीरे पुलिस जत्था पहुंचना शुरू कर देलकै ह. पुलिस अधिकारी से सीधा बातचीत के दौरान ई जाने के ज्यादा उत्सुकता हलै कि मरे वाला के की मुआवजा मिलतै. मौका-ए-वारदात पर पहुंचल रिपोर्टर के प्रथमिकता हलै कि मरेवाला के नाम गिना देल जाय ताकि मुआवजा के समय कुछ सबूत हो. प्रचार से बच्चल समय के आधा से अधिक भाग में ई समाचार के कवरेज के बाद संक्षिप्त में दर्शक के ई बता देल गेलै कि आज दू महान हस्ती के जन्म दिवश भी है- महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री. हमरा पता है आज पूरा दिन बापू और शास्त्री जी के जन्मदिन पर नरसंहार के कहानी हावी रहतै. काहे नै हो भाय, टी आर पी तो अपराध और बलात्कार देखा के बढो है.

की विडंबना है कि अहिंसा के गुरू बापू के जन्मदिन पर नक्सली द्वारा नृशंस नरहत्या के नंगा नाच हो रहलै हऽ औउर हमनी सब लाचार बेबस समाचार देख देख के मने मने कुडकुडाये के अलावा कुच्छो नै कर पा रहलियै ह.सोचल जाय त कि असली समस्या नक्सलवाद हैऽ? या नरसंहार, या फेर आतंकवाद. हमरा समझ से समस्या के जड में ई सब कुछ नै हैऽ. समस्या के जड में हैऽ- गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा औऊर आम आदमी के मन पर राज करेवाला डर. डर जे आज से सदियों पहले बख्तियार खिलजी बौद्ध विहार और नालंदा विश्वविद्यालय में आग लगाके पैदा कैलकै जेकरा पर बाद के मुसलमानी सल्तनत अपन बिरयानी बनैलकै, औउर ब्रितानिया हुकूमत राज कैलकै. बचल खुचल कमी जमिंदारी प्रथा पूरा कर देलकै. जन मानस में डर बनल रहे ई लगी जरूरी हलै कि पूरा प्रदेश अशिक्षित हो, गरीब हो लाचार हो. ईहे मुलमंत्र के जाप करके देश के राजनैतिक नेतृत्व के भी इहे कोशिष रहलै कि प्रांत के कोई तरक्की नै होवे देल जाय. और ईहे कारण से एक सर्वथा अदूरदर्षी और स्वार्थी नेतृत्व के प्रश्रय देल गेलै. जानबूझ के जातिवाद के विष घुट्टी में डाल डाल के जन-मानस के पिलावल गेलै. जेकर परिणाम होलै बिहार के सर्वांगिन पतन. दुःख तो ई बात के है कि कोई नेतृत्व अभी भी मूलचूल परिवर्तन के बात नै कर रहलै ह.

लगभग हरेक दिन कहैं न कहैं या तो नरसंहार होवो हैऽ, या बलात्कार या उठाईगीरी. मीडिया वाला दिनभर हू हा कैलक, एक जात वाला दोसर जात पर इल्जाम लगैलक, नेता जी सब एक दोसरा पर कीचड उछाललका और जादे से जादे मुआवजा देवे के बात कैलका, फेर सब खतम. कोइयो समस्या के जड में जाय के बात नै करो है. हम कहो हियै कि ई नक्सलवाद बनलै कने से. बेरोजगारी, भूख, अशिक्षा, जातिवाद के मार से त्रस्त एक बडा समूह के कुछ नै बुझैलै त उठा लेलेकै हाथ में तमंचा. लेकिन ओकरा तमंचा देवे वला के हलै? तमंचा सिखावे वाला के हलै? सिखा के निसाना देखावे वाला के हलै? और निसाना सध गेला के बाद पीठ थपथपावे वला के हलै? जी हां नक्सलवाद के जड वहां हैऽ. नरसंहार के पीछे के कारण ऊ हैऽ. तो बतावऽ पहुंच पैवा कोय ऊ जड तक? चाणक्य जैसन कोय है जे डाल पैतै ऊ जड में मट्ठा और मिटा देतै ओकर नामोनिशान? कोय है जे चंद्रगुप्त बनके ऊ महान चाणक्य के दिशा निर्देश में समाज में फैलल हजारों लाखों घनानंद रुपी आतताई के खतम कर पैतै?

और जबतक ई नै होवो हैऽ तबतक बिहार में उहे सब होते रहतै जे हो रहलै ह.

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